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Friday, December 19, 2025

शिक्षा ही पूजा है — संत गाडगे बाबा का लोकशिक्षा दर्शन

शिक्षा किसी व्यक्ति, जाति या वर्ग विशेष की ठेकेदारी नहीं है।

गरीब से गरीब परिवार का बच्चा भी यदि अवसर और संकल्प पाए, तो उच्च शिक्षा ग्रहण कर अनेक डिग्रियाँ हासिल कर सकता है। इसी सत्य को जीवन भर व्यवहार में उतारने वाले कर्मयोगी संत थे— संत गाडगे बाबा।

गाडगे बाबा यह भली-भांति समझते थे कि शिक्षा के बिना सामाजिक मुक्ति असंभव है। वे बाबा साहब डॉ. आंबेडकर के शिक्षा दर्शन से गहरे प्रभावित थे और जानते थे कि वंचित समाज को आगे बढ़ने से रोकने के लिए सबसे पहले उसकी शिक्षा छीनी जाती है। इसीलिए वे अपने अनुयायियों से बार-बार कहते थे—

“शिक्षा बड़ी चीज है। शिक्षा ग्रहण करना ही पूजा है, मंदिर में पूजा करना नहीं।” उनका स्पष्ट मानना था कि शिक्षा के माध्यम से ही समाज को गरीबी, अन्याय, अत्याचार और शोषण से मुक्त किया जा सकता है।

लोक शिक्षक गाडगे बाबा

भले ही संत गाडगे बाबा औपचारिक रूप से शिक्षित नहीं थे, लेकिन उनके पास अनुभवजन्य और परिस्थितिजन्य ज्ञान का अपार भंडार था। वे जहाँ भी जाते, कीर्तन, प्रवचन और संवाद के माध्यम से लोगों में चेतना का संचार करते थे। स्वच्छता, श्रमदान और सामाजिक सहयोग के बल पर उन्होंने वंचित तबकों के इलाज, शिक्षा और आश्रय के लिए अभिनव प्रयास किए। इसी कारण उन्हें ससम्मान “लोक शिक्षक” कहा गया।

श्रमदान से शिक्षा संस्थानों तक

गाडगे महाराज ने समाज के सहयोग और श्रमदान से धर्मशालाएँ, कुष्ठ आश्रम, अस्पताल, अनाथालय, बालवाड़ी, विद्यालय, छात्रावास और पुस्तकालय स्थापित कराए। उन्होंने समर्पित और जुझारू लोगों को समाज सेवा के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रेरित किया। दर्जनों शिक्षण संस्थाएँ आमजन के लिए सुलभ कराईं। वे शिक्षा को विकास की कुंजी मानते थे और कहते थे—

“शिक्षा के बल पर कोई दिल्ली की राजगद्दी तक पहुँचता है, और शिक्षा के अभाव में कोई बोरीबंदर स्टेशन पर कुलीगीरी करता है।”

पूजा बहुत, शिक्षा कम — एक करारा सत्य

गाडगे बाबा समाज की विडंबना पर तीखा प्रश्न उठाते थे— “हमारे देश में ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा सबसे अधिक होती है, फिर भी दुनिया में सबसे ज़्यादा अनपढ़ लोग भारत में हैं।” यही कारण था कि आचार्य केते जैसे विद्वान उन्हें “चलता-फिरता विद्यापीठ” कहा करते थे।

अनपढ़ होकर भी शिक्षा की मशाल

आज संत गाडगे बाबा हमारे बीच भले ही शारीरिक रूप से नहीं हैं, लेकिन उनके विचार और कार्य सरकार और समाज—दोनों की नींव बन चुके हैं।

अनपढ़ होते हुए भी आजीवन शिक्षा की अलख जगाने वाले इस महान लोकसंत को बार-बार नमन।

Thursday, December 17, 2015

डर गए मेरी रफ्तार से तो लो आरक्षण छोड़ता हूँ मैं !!!!

डर गए मेरी रफ्तार से तो लो आरक्षण छोड़ता हूँ मैं !!!!
तुम बस ये ऐलान कर दो कि मैं तुम जैसा हूँ और तुम मेरे जैसे ।कह दो कि ब्रह्मा के मुख से नही निकले तुम !! 
नही निकले उसकी भुजाओं से ! या फिर उसके पेट से !! क्योंकि मैं वहां से बिलकुल नही निकला !!!
मुझे मेरे माता-पिता ने जन्म दिया है एक प्राकृतिक प्रक्रिया के द्वारा और कहो कि तुम मुझसे किसी भी मायने में उच्च और श्रेष्ठ नही हो !!!
और अगर सचमुच मुझसे श्रेष्ठ हो तो साबित करो !!
पैर और मुँह का अंतर सिर्फ अधिकार तक सीमितहै क्या ????
कर्तव्य नही बनता क्या श्रेष्ठ लोगों का अपने से कमजोरों के प्रति ???
पर जब खाने की बारी आये तो तुम याचक बन जाते हो !!!
और खिलाने की बात आये तो not reachable हो जाते हो ???
ये आरक्षण खत्म करते हैं
!!!चलो पहले बताओ अपनी कुटिलता के किस्से !!!!

और माफ़ी मांगो कि हमारे पूर्वजों ने झूठ बोल कर छल कपट से  धर्म के नाम पर जाति के नाम पर और झूठे ग्रन्थों के नाम पर पूरे देश को मूर्ख बनाये रखा , जिसका दुष्परिणाम आज तक देश और पूरी पीढ़ी भुगत रही है । ये भी कहो कि सभी आदमी बराबर होते हैं किसी जाति में पैदा होकर ना कोई नीच होता है और ना ही ऊँचा !!!!!
कह दो कि मन्दिरों में बैठकर तुमने मलाई काटी है । अपनी शस्त्र विद्या से तुमने ही निर्दोष भाईयो का गला काट कर उनके साथ विश्वासघात किया है । तुमने छुरा हमेशा अपनों की पीठ में घौंपा है ।डरा धमका कर तुमने जमीन पर अपना कब्जा किया और मुट्ठी भर अनाज के बदले खून के आंसू रुलाए हैं । कह दो कि तुम लोगों ने किसी मजबूर की मजबूरी का लाभ उठा कर एक रुपये के बदले सूद के रूप में उसकी जिंदगी की सारी मेहनत सम्मान इज्जत और अंत में उसकी जान पर भी पीछा नही छोड़ा ।और उसी एक रुपये को उसकी पीढ़ियों से भी वसूल किया है ।
जिस जिस आदमी ने आरक्षण के खिलाफ ज़हर उगला है वो मेरी उपरोक्त बातें अपनी वाल पर लिखे ।
सरकार के पास चिट्ठी लिखे मन्दिर की दीवारों पर लिखवाये और सभी सार्वजनिक स्थानों पर ठीक उसी अंदाज में पर्चे छपवा कर बांटे कि (पुजारी ने सांप देखा, सांप मनुष्य बनकरबोला etc वाला मैटर )। और सबसे महत्वपूर्ण बात उस गलती को सुधारने का प्रयास करें जो तुम्हारे दादा नाना ने की है । आरक्षितों के साथ "बेटी
-रोटी का व्यवहार" करें । कीमत ज्यादा नही है दोस्तों औरएकदम दीवाली धमाका है तुम्हारे ही अंदाज में । मैं नही कहूँगा कि 2000 साल तक शिक्षा , सम्पति के अधिकार से वंचित रहना पड़ेगा । गाँव से बाहर जंगल में रहना पड़ेगा। गले में हांड़ी और कमर पर झाड़ू बाँधनी पड़ेगी । खेतों में जानवर की तरह मेहनत करो और हल चलाना पड़ेगा । फसल के समय खाने के दानों के लिए गिड़गिड़ाना पड़ेगा । नालियों की और गटर की सफाई करनी पड़ेगी । और रूपये के बदले पीढियां गंवानी पड़ेंगी । क्योंकि जिसने इतना सहा है उसकी झुकी कमर बोझिल मन मष्तिष्क आँखों के आंसू शरीर की त्वचा जुल्म को याद कर के खड़े होने वाले रौंगटे आज भी सम्मान की ,इज्जत की, भूख की ,कीमत समझते है ।और मैं उसी का हिस्सा हूँ ।



Thursday, November 19, 2015

🔄मध्यकालीन एवं आधुनिक भारत देश का अन्य देशों से पिछड़ने का कारण🔄


जिस समाजिक व्यवस्था में.....कपड़े धोने के लिए "धोबी' नाम की "जाति" नहीं थी...
वहाँ इस काम को आसान बनाने के लिए वाशिंग मशीन का आविष्कार हुआ....... 

जिस सामाजिक व्यवस्था में "पालकी" ढोने के लिए "कहार" नाम की "जाति" नहीं थी...
वहाँ 'मोटर कार' और 'रेल इंजन' का आविष्कार हुआ.........

जिस समाजिक व्यवस्था में जन्मजात "मेहतर" नहीं थे, वहाँ 'कमोड' और "फ़्लश टॉयलेट" की खोज हुई..... .....
जिस समाजिक व्यवस्था में "मुफ़्त" में काम करने वाली किसान और मजदूर जातियाँ नहीं थी....
वहाँ ट्रेक्टर, टीलर और 'थ्रेशर' का आविष्कार हुआ.......

इसी तरह भारत में न रूई से धागा बनाने की मशीन बनी... न धागे से कपड़ा बनाने की मशीन..... !!!!
इन सब काम के लिए मुफ़्त का या सस्ता श्रम करने वाली जातियाँ थीं/हैं।
...इस तरह आप जितनी चाहे उतनी लंबी लिस्ट बना ले..... ???
काहिलों'और 'निठल्लों' की शरणस्थली भारतीय जाति व्यवस्था आपको निराश नहीं करेगी.....!!!!!
...जिनका "ज्ञान" पर कंट्रोल था..वे निठल्ले थे...!!!!
और फ़्री लेबर मिलने के कारण उन्हें कभी "मशीन" बनाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी...... !!!!
.....इसलिए औद्योगिक क्रांति से लेकर... दुनिया की वैज्ञानिक प्रगति.... भारत के पास कभी नहीं आ सकी.......!!!!!
जिन आलसी, अकर्मण्य,अंधविश्वासी,पाखंण्डवादी असमानतावादी,सास्कृतिक आर्थिक,राजनीतिक एवं धार्मिक व्यवस्थाकारो के पास...यदि मुफ़्त या बेहद सस्ता इनका समस्त काम करने वाले कहार, धोबी जैसी हजारो जातियों के लोग हों तो.... वे मोटर कार बनाने या मानव उपयोगी आविष्कार करने की क्यों सोचते भला ...!!!!!
परन्तु आधुनिक लोकतांत्रिक युग के भारत के पास आसीम संभावनायें है... विश्वगुरू एक बार पुन: बनने की...
...बशर्ते इस देश के "निठल्ले" समतावादी सामाजिक व्यवस्था को कायम रहने दे.....
जय भीम जय भारत

Wednesday, November 4, 2015

प्रोन्नति में आरक्षण सम्बंधी बिल लोकसभा में पारित कराने हेतु अनुसूचित जाति/जनजाति के लोकसभा सांसदों को लिखे जाने वाला पत्र !


सेवा में,
                        श्री/कु०/श्रीमती --------------------------जी
                        सांसद
                        भारत सरकार नई दिल्ली!
विषय :- प्रोन्नति में आरक्षण सम्बन्धी बिल {117 वां संविधान संसोधन} लोकसभा में पारित कराने के सम्बन्ध में ! 
महोदय/महोदया,
                        उपरोक्त विषयक आप अवगत ही होंगे कि प्रोन्नति में आरक्षण सम्बन्धी बिल {117 वां संविधान संसोधन} पूर्व में ही भारत की संसद के एक अंग राज्य सभा में पारित हो चुका है जबकि लोकसभा में पारित किया जाना अभी बाकी है ! राज्य सभा में उक्त बिल के पारित हो जाने के बावजूद लोकसभा में पारित न होने के कारण उक्त बिल की कोई साथर्कता नहीं है ! जिस कारण उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति/जनजाति के लगभग दो लाख अधिकारी व कर्मचारी पदावनत कर दिए गए हैं तथा अन्य राज्यों में भी उक्त प्रक्रिया की तैयारी है ! इसके आलावा ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगो की उन्नति के विरोधियों की मंशा के अनुरूप कुछ ही दिनों में अनुसूचित जाति/ जनजाति की समस्त अथवा आंशिक रूप से  कुछ उपजातियों के लोगो को सरकारी नौकरियों एवं राजनैतिक आरक्षण से भी वंचित कर दिया जायेगा ! आप जानते ही होंगे कि 24 सितम्बर 1932 को भारतीय संविधान निर्माता डॉ० भीमराव आंबेडकर और श्री मोहनदास करमचंद गांधी के मध्य हुए पूना समझौते के तहत अंग्रेजों द्वारा प्रदान किये गए दोहरे मताधिकार के बदले में अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगो को आरक्षण का अधिकार दिया गया था !
                        चूँकि आप लोकसभा की उन आरक्षित सीटों से सांसद चुने गए हैं, जिन सीटों पर भारत के संविधान में निहित अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगो को राजनैतिक आरक्षण का संरक्षण प्राप्त है, अर्थात आप अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगो के प्रतिनिधि के रूप में भारत की संसद में सांसद चुने गए हैं ! हमें आपको यह स्मरण कराने की आवश्यकता नहीं होती यदि आपके उक्त महत्वपूर्ण पद पर विराजमान होने के बावजूद अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगो के वांछित और वाजिब अधिकारों पर कुठाराघात न किया गया होता, लेकिन लोकसभा में अनुसूचित जाति/जनजाति के प्रतिनिधि के रूप में आपकी मौजूदगी के बावजूद अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगो को उनके वांछित और वाजिब अधिकारों से वंचित किया जा रहा है ! इसी परिपेक्ष्य में मा० सर्वोच्च न्यायलय के एक आदेश को आधार मानकर सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण के अधिकार को समाप्त मानकर उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति/जनजाति के अधिकारीयों/कर्मचारियों की पदावनति कर दी गई है ! जिससे इस वर्ग के अधिकारीयों/कर्मचारियों को गहरा आघात पहुंचा है और मनोबल टूटा है ! यह भी विदित हो कि उक्त प्रक्रिया अन्य राज्यों में भी अपनाई जाने की प्रबल सम्भावना बन गई है ! जिसे समय रहते नहीं रोका गया तो अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों को अपने ही देश में अपने अधिकारों से विरत कर गुलामी की जिन्दगी जीने के लिए मजबूर कर दिया जायेगा !
                        अतः भारत के मूलनिवासी अनुसूचित जाति/जनजाति समाज को प्रदत्त संवैधानिक अधिकारों को संरक्षित करने हेतु आपसे अनुरोध है कि प्रोन्नति में आरक्षण सम्बन्धी बिल {117 वां संविधान संसोधन} जो राज्यसभा में पहले ही पारित किया जा चुका है, को लोकसभा में पारित कराने का अपने स्तर से प्रतिएक प्रयत्न करने का कष्ट करे ! प्रयत्न करने के बावजूद यदि आप उक्त बिल पारित कराने में सफल नहीं हो पाते हैं, तो आप कृपया सांसद पद से त्यागपत्र देकर समाज के मध्य आ जाये और समाज के साथ सड़क पर संघर्ष करने में अपनी भूमिका निभाने का कष्ट करे !
आदर सहित !
भवदीय,
हस्ताक्षर--------------------
नाम ------------------------
पता -------------------------
मोबाइल न० -----------------
जनहित में प्रस्तुति :- भारतीय मूलनिवासी संगठन,  आदेश नागोरी, मोबाइल न० 9719304041  
नोट :- 1- कृपया इस पत्र को अनुसूचित जाति/जनजाति के सभी सांसदों/अपने क्षेत्र के सांसदों को लिखकर भेजने का कष्ट करे ! अन्य सभी सामाजिक संगठनो के पदाधिकारियों/प्रतिनिधियों से भी अनुरोध है कि वे भी अपने-अपने लेटर पैड पर उक्त पत्र लिखकर भेजने का कष्ट करे ! विदित रहे कि आजादी से पूर्व हमारे समाज के जागरूक लोगो ने दोहरे मताधिकार को प्राप्त करने हेतु इसी प्रकार का पत्र अंग्रेजो और डॉ० भीमराव आंबेडकर को भेजा था ! तभी हमें दोहरा मताधिकार प्राप्त हुआ था ! 
2- यदि उपरोक्त पत्र से आप सहमत हो तो फेसबुक/ट्विटर/whatsapp पर अपने सभी मित्रो और ग्रुपों में इसे शेयर जरुर करने का कष्ट करे !
3- इस पत्र की कोपी करने में आपको जरा सा कष्ट तो होगा ही साथ में कुछ पैसे भी लगेंगे ! लेकिन आपका यह एक पत्र ही हमें अपना खोया हुआ अधिकार वापस दिला सकता है ! 
मंजिल वही----------सोच नई !  हम होंगे कामयाब -------------------एक दिन !  
जय भीम, जय भारत, जय मूलनिवासी ! 

Thursday, October 29, 2015

बिगुल बज गया साथियों, उठो अब संगठित होकर सड़को को पे आ जाओ रे

अपनी इज्जत अपनी अस्मत
अपनी लाज बचाऔ. रे,.
दूर खड़े क्या सोच रहे हो
सड़कौं पर आ जाऔ. रे ,
आग लगी है कहीं दूर तो
घर तक भी आ सकटी है ,
आज बिरादर झुलस रहा
कल तुमको झुलसा सकती है,,
उठो संघठित होकर के सब
भड़़की आग बुझाऔ. रे
दूूर खड़े क्या सोच रहे हो
सड़कौं पर आ जाऔ रे
कुत्ते बिल्ली समझ के हमको
आतातायी मार. रहे
कायर बन कर छुुपे घरौं मै
हम बैठे फुफकार रहे,
दलने पिसने सेे अच्छा है
मिट्टटी मै मिल जाऔ रेे
दूूर खड़े क्या सोच रहेे हो
सड़कौं पर आ जाऔ रे
रोक नही सकती है हम पर
होते अत़्याचारौ को
वोट. बल पर धूल चटादो
इन ज़ालिम सरकारौ को
न्याय मिलेेगा तब ही जब
अपनी सरकार बनाऔ रे
दूर खडे क्या सोच हो
सड़कौं पर आ जाऔ रेे
रोक सको तो बढ़ कर रोको
ख़ून के जिम्मेदारौ को
रोको,रे़ाको दलित वर्ग पर
बढ़ते अत़्याचारौ को
उठोे संघठित आँधी बनकर
अम्बर तक छा जाऔ रेे
दूर खड़े क्या ताक रहे हो
सड़कौ पर आ जाओ रे,,,
��जय भीम��

एक मित्र की फ़ेसबुक वाल से

Saturday, October 17, 2015

जाति का यथार्थ

वो कह सकते हैं - हिन्दू-मुस्लिम भाई भाई,
लेकिन वो नही कह सकते - ब्राह्मण चमार भाई भाई ।
वो कह सकते हैं हिन्दू-सिख भाई भाई
लेकिन वो नही कह सकते - ठाकुर-वाल्मिकी भाई भाई ।
वो कह सकते हैं - हिन्दू-इसाई भाई भाई,
लेकिन वो नहीं कह सकते वैश्य कंजर भाई भाई ।
वो कह सकते हैं मानव-मानव एकसमान ,
लेकिन वो नही कह सकते सभी जातियां एकसमान ।